खुद को बिखरने मत देना

खुद पुकारेगी मंजिल तो ठहर जाऊंगा

वरना मुसाफिर खुद्दार हूँ यही गुजर जाऊंगा

 

साँस लेना भी कैसी आदत है

जिए जाना भी क्या रवायत है

कोई आहत नहीं कही भी

ना ही कोई साया है

पाँव बेहिसाब चलते ही जाते है

एक सफर है जो बहता ही जाता है

कितने बरसो से कितने सदियों से

जिये जाते है जिए जाते है

आदतें भी अजीब होती है

 

जो तेज हवा का झोका है

उसको किसने रोका है

जो सबके लिए मुश्किल है

उसके लिए वो मौका है

 

सामने हो मंज़िल तो रस्ते न मोड़ना

जो भी मन में हो वो रास्ता न तोडना

कदम कदम पर मिलेंगी मुश्किलें आपको

पर सितारे छूने के लिए कभी ज़मीन मत छोड़ना

 

जो हो गया उसे सोचा नहीं करते

जो मिल गया उसे खोया नहीं करते

हासिल उन्हें होती है सफलता

जो वक़्त और हालत पर रोया नहीं करते

 

खुद को बिखरने मत देना

कभी किसी हाल में

लोग गिरे हुए माकन की

ईंट तक ले जाते है

 

वादों से बंधी जंजीर थी

जो तोड़ दी मैंने

अब से खुद पर भरोसा करेंगे

दुनिया की रह छोड़ दी मैंने

 

ज़िन्दगी की खोज में इंसान को

अकेले ही निकलना पड़ता है

क्योंकि जो हम खोजना चाहते है वो

दुसरो से मेल नहीं खाता

 

ज़िन्दगी ये मन की काटों भरा सफर है

इससे गुजर जाना ही असली पहचान है

बने बनाये रास्तो पर तो सब ही चलते है

खुद रस्ते जो बनाये वो ही तो इंसान है

 

ख्वाहिशो से नहीं गिरते फूल झोली में

कर्म की साख को हिलाना होगा

कुछ नहीं होगा अंधेरो को कोसने से

अपने हिस्से का दिया खुद ही जलाना होगा

 

बड़ी हसरत से सर पटक पटक कर गुजर गयी

कल मेरे शहर से आँधी

वो पेड़ आज भी मुस्कुरा रहे है

जिनमे हुनर था थोड़ा झुक जाने का